Wednesday, February 1, 2017

भारत: बाह्य सुरक्षा की चुनौतियां

1. बाह्य सुरक्षा क्या है
बाह्य सुरक्षा का अर्थ किसी देश राष्ट्र‚ एक राज्य या एक राष्ट्र-राज्य को उसकी पहचान‚ अर्थव्यवस्था या उसके अंगों‚ स्थिरता‚ सीमाओं‚ जनसंख्या और विशेष रूप से लोगों की भावनाओं‚ उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ सामाजिक और तकनीकी और औद्योगिक ढांचे को उत्पन्न खतरे से है। ऐसा खतरा उत्पन्न हो सकता है जिसे नकारा नहीं जा सकता और वास्तविक है जबकि उसका हल वास्तविकता में बदलता नहीं दिखाई दे रहा है।
एक देश अपनी बाह्य सुरक्षा को लेकर हमेशा खतरे की स्थिति में रहता है और वह इस खतरे को कूटनीति‚ गठबंधन‚ भूरणनीतियों आदि से नकारने की निरंतर प्रक्रिया में लगा रहता है।
2. भारत की बाह्य सुरक्षा की चुनौतियां
भारत जिन बाह्य खतरों का सामना कर रहा है‚ उसमें हल्के खतरे शामिल हैं जो प्रभावित करते हैं
(a) लोगों की दिमागी सोच को‚ जैसे एक औपनिवेशिक सोच और अपनी स्वयं की पहचान खोने के प्रति अजागरुक।
(b) लोगों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य
(c) देश की अर्थव्यवस्था को खतरा जैसे उसे निरंतर नुकसान पहुंचाना‚ उसके बाजार को निगलकर और जाली मुद्रा का प्रचलन बढ़ाकर या अन्य उपायों द्वारा।
(d) साइबर हमलों‚ साइबर युद्ध‚ युद्ध सूचनाओं की जोड़तोड़ और इलेक्ट्रोनिक युद्ध जैसे उपायों से देश की संवेदनशीलता को प्रभावित करना।
इस समय भारत वास्तव में बाह्य मोर्चे पर कुछ चुनौतियों का सामना कर रहा है, इनमें से कुछ इसकी सीमाओं, दोनों सीमाओं भूमि और समुद्री पर हैं, इसके क्षेत्र में है और कुछ सैन्य, कार्रवाइयों और उसकी योजनाओं के द्वारा हैं। इन चुनौतियों में शामिल हैं-
(a) यदि भारत ने पाकिस्तान से उत्पन्न देश को अस्थिर करने वाले आतंकवाद जैसे खतरों का उन्मूलन करने के लिए कोई कठोर निर्णय लिया तो दो मोर्चों का सामना करना होगा।
(b) दोनों पड़ोसियों से परमाणु खतरा
(c) चीन-पाकिस्तान गठजोड़
(d) अरुणाचल प्रदेश और सिलिगुड़ी गलियारे को खतरा और
(e) समुद्री खतरा
भारत वास्तव में इन सभी खतरों का सामना कर रहा है। विश्व में ऐसा कोई भी देश नहीं है जो वास्तव इस आयाम और विविध प्रकार के खतरों का सामना कर रहा है। इसके बावजूद भारत अपनी सुरक्षा के लिए बहुत कम काम कर रहा है, चाहे वह भारत के नागरिकों की सोच द्वारा समर्थन हासिल करना हो, अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित करना हो या रक्षा तैयारी का क्षेत्र हो।
भारत विश्व का एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जो दो परमाणु हथियार संपन्न देशों का सामना कर रहा है। एक देश भारत के प्रति पागलपन की हद तक ईर्ष्यालु है और दूसरा इसके क्षेत्र और लोगों को हड़पने का मंसूबा रखता है। जबकि सभी खतरे वास्तविक और अस्तित्व में हैं, इस अध्याय में अधिकांशतः भूरणनीतिक परिप्रेक्ष्य पर बल दिया जाएगा।
बहुमुखी चुनौतियां
भारत की बाह्य सुरक्षा पर विचार करते समय देश के नीति-निर्माता अपने दिमाग में अपने छोटे पड़ोसियों के आर्थिक पिछड़ेपन और राजनैतिक अस्थिरता, पाकिस्तान के भारत के साथ लगातार शत्रुतापूर्ण संबंधों को रखते हैं। वह आतंकवाद को विदेश नीति के और एक बाध्यकारी समानता हासिल करने के उपकरण के रुप में प्रयोग करता है। भारत, एक ताकतवर चीन के इरादों का विरोध करता है। जो एशिया की सर्वोच्च शक्ति बनना चाहता है। बाह्य सुरक्षा परंपरागत सैन्य खतरे के आकलन की मांग करेगी लेकिन इसके अतिरिक्त आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय क्षरण, जनसंख्या के बदलाव और जल एवं बाजार सहित प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच नए कारक हैं। छोटे देशों की कमजोरी से उत्पन्न खतरों की और बड़े देशों के इरादों से पैदा खतरों की प्रकृति भिन्न होती है। चीन और पाकिस्तान भिन्न हैं और उनके लिए भिन्न प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।
सीमा-पार के खतरे
अधिकांश बाहरी खतरे अनसुलझे सीमा विवादों के कारण हैं। भारत का चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश के साथ सीमा विवाद है। चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ जम्मू एवं कश्मीर में सीमापार से जेहादी आतंकवाद को प्रायोजित कर रहा है। इनके आईएसआई और पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों जैसे-लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद से संबंध हैं जो अंतर्राष्ट्रीय जेहादी संगठनों तालिबान और अल-कायदा से अटूट रूप से जुड़े हैं।
बांग्लादेश के पूर्वोत्तर के आतंकवादी संगठनों उल्फा और नागा धड़ों के आधार के रुप में स्थापित होने के बाद से वहां से भी गंभीर खतरा पैदा हो गया। बाद में यह आईएसआई प्रायोजित आतंकवादियों की भारत-बांग्लादेश की भेद्य सीमा में घुसपैठ का एक प्रमुख केन्द्र बन गया। इसे खत्म करने में पड़ोसी राष्ट्रों और जेहादी समूहों के द्वारा निकट भविष्य में परमाणु हमले की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए चीन-पाकिस्तान गठजोड़ का महत्व है।
छोटे पड़ोसी
एक अरब भारतीय स्वयं के लिए पर्याप्त समस्या हैं, इस पर वे एक समस्याग्रस्त ग्रह के समस्याग्रस्त हिस्से में निवास करते हैं। वे सीमित संसाधनों के साथ विस्फोटक आकांक्षाओं और पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में तंग अर्थव्यवस्थाओं के युग में रह रहे हैं। यह क्षेत्र निरंतर आर्थिक रूप से पिछड़ा और रानैतिक रुप से अस्थिर बना हुआ है। भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश निरंतर धार्मिक कट्टरतावाद की और तीव्रता से फिसल रहे हैं। भारत को अपने पड़ोसियों से निरंतर बड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा।
नेपाल में निरंतर घरेलू कलह जारी है क्योंकि वह माओवादी हिंसक आंदोलन के बीच लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए प्रयासरत है। बांग्लादेश में लोकतंत्र की समस्याओं के कारण बीच-बीच में सैनिक शासन भी वैधता प्राप्त करता है और वहां तालिबानी प्रभाव भी बढ़ रहा है। श्रीलंका में लिट्टे के साथ दीर्घकालिक गृहयुद्ध समाप्त हो चुका है लेकिन बहुसंख्यक सिंहली आबादी तमिल अल्पसंख्यकों की मांगों को समझने को तैयार नहीं है। म्यांमार के साथ भारत की लंबी भू-सीमा है और वह सामान्यतः एक अलग-थलग देश है लेकिन इस बात की आशंका बराबर बनी रहती है कि चीन वहां प्रमुख शक्ति के रुप में स्थापित हो सकता है। भारत के लिए पाकिस्तान के संदर्भ में और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए अफगानिस्तान का रणनीतिक महत्व है लेकिन वह अंतहीन संघर्षों में फंसा हुआ है।
विश्व में मुस्लिम आबादी का सबसे बड़ा संकेन्द्रण भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में है जहां करीब 45-46 करोड़ मुसलमान रहते हैं। इनमें करीब एक-तिहाई भारत में रहते हैं। यह उनको सर्वाधिक लंबे समय से लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहने वाली सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी बना देता है। शेष मुस्लिम एक तानाशाही और उग्र इस्लामी शासन में हैं जहां राज्य की नीतियां उदारवादी समाजों को कमजोर करती हैं जबकि अमेरिका-विरोधी भावनाएं तीव्र गति से बढ़ती हैं। भारत के समक्ष समस्या अपनी मुस्लिम आबादी को बाह्य प्रभाव से बचाए रखने की है, जिसका प्रयास निस्संदेह किया जा रहा है। इसके साथ ही हिन्दू उग्र प्रतिक्रिया को उभारने की कोशिश भी हो रही है।
भारत के आकार और शक्ति के कारण इसे अक्सर क्षेत्रीय प्रमुख या कभी-कभी एक दबंग कहा जाता है। जब वह मदद का प्रयास करता है तो उस पर घमंडी और घुसपैठ करने तथा मामले से दूर रहने पर भी घमंडी और उदासीन होने का आरोप लगता है। नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भारत को कोसना सामान्य बात है। शायद यह स्वाभाविक है कि कुछ लोग स्थानीय शक्ति के खिलाफ दूरस्थ शक्ति की प्रशंसा में सहज महसूस करते हैं। कुछ पड़ोसी भारत द्वारा अक्सर आपसी समृद्धि में सहभागिता के पेश किए जाने वाले प्रस्तावों को भी स्वीकार करने की इच्छा नहीं रखते। उनको लगता है जैसे भारत गरीबी में साझेदारी करना चाहता है। ये देश भौगोलिक तर्क को नकार कर भारत से पृथक रहकर अपनी सुरक्षा चाहते हैं।
परिणामस्वरूप उपमहाद्वीप के देश आर्थिक संभावनाओं और अवसरों का लाभ उठाने में विफल रहे, क्योंकि वे बहुत मुश्किल से आपस में व्यापार करते हैं। पारगमन मार्गों को इंकार कर दिया गया, समान रेल और सड़क संपर्क का वास्तव में अस्तित्व ही नहीं है। पड़ोसियों के बीच समान आर्थिक और सुरक्षा अवधारणाओं की कमी के कारण बहुपक्षीय संगठनों जैसे सार्क (दक्षेस) आदि पंगु हो गए हैं। इसके विपरीत ईयू और आसियान प्रतिनिधियों के विविध हितों के लिए साझा मंच का काम करते हैं। अन्य समस्या यह है कि एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रुप में भारत की वैश्विक स्तर पर स्वीकृति बढ़ रही है लेकिन यह क्षेत्र नई स्थिति का लाभ उठाने में बहुत धीमा है।
भारत का सबसे बड़ा दुःस्वप्न इसके विफल पड़ोसी राष्ट्र और उनके शरणार्थी हैं, जिनका भारत पर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव पड़ता है। अपने आर्थिक आकार के बावजूद भारत के पास इन देशों की चरमराती व्यवस्था को हमेशा सहारा देने की क्षमता नहीं है। एक पूर्णतः पंगु राष्ट्र बनना है या नहीं, यह उस देश का निजी चयन है लेकिन इससे निपटना भविष्य में भारत के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। उदाहरण के लिए भारत से तीन ओर से घिरे और भारत के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण बांग्लादेश के पास अगली इस्लामिक क्रांति का जन्म स्थान बनने या एक तर्कसंगत आधुनिक आर्थिक राज्य बनने का विकल्प है। भारत के साथ करीबी आर्थिक और व्यापारिक गठबंधन से वहां रोजगार और सही समृद्धि पैदा होगी। बांग्लादेश की समृद्धि में भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है लेकिन इसे देश की घरेलू राजनैतिक जटिलता से नुकसान होता है जो भारत विरोधी मनोवृत्ति कायम रखना चाहता है। ठीक यही सिद्धान्त नेपाल पर भी लागू होता है जहां राजनैतिक परिदृश्य अनिश्चित दिखाई दे रहा है। वहां मुख्यधारा के राजनैतिक दल उग्रवादी माओवादियों से जमीन वापस छीनने के संघर्ष में लगे हैं जबकि माओवादी व्यवस्था में संपूर्ण बदलाव चाहते हैं। श्रीलंका भारत के साथ बेहतर राजनैतिक और आर्थिक गठबंधन चाहता है लेकिन इसे वहां की नस्लीय समस्या और कभी-कभी चीन और भारत के बीच संतुलन का दुराग्रह रोकने का कार्य करता है। भूटान ने भारत के साथ सफलतापूर्वक अपनी आर्थिक व्यवस्था का समायोजन कर लिया है और उससे लाभान्वित हो रहा है। म्यांमार को भारतीय हितों के लिए खोलना बहुत कठिन कार्य है। इसके अलावा वह अन्य देशों की तुलना में चीन को खुली छूट देने के विरुद्ध किसी भी सुझाव को भी खारिज करता है।
हरसंभव दिशा से घेराबंदी
भूराजनीतिक रुप से भारत, चीन और पाकिस्तान की दीर्घकालिक धुरी के बीच स्थित है, इसमें अन्य चीजों के अतिरिक्त गुप्त परमाणु, मिसाइल और खुफिया सहयोग शामिल है। उत्तर कोरिया के साथ चीन के गंभीर मतभेद उभरने के बाद अब पाकिस्तान स्पष्ट रुप से चीन का केवल एकमात्र वास्तविक सहयोगी और करीब-करीब चीन का 24वां प्रांत बन चुका है।
परंपरागत रुप से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में नजदीकी संबंधों को प्रगाढ़ करने के लिए चीन और पाकिस्तान में बहुत कम समानताएं हैं। उनकी धुरी का निर्माण भारत को नीचा दिखाने के एक साझा उद्देश्य पर हुआ है, जैसा कि विदेश विभाग के पूर्व अधिकारी डेनियल मर्की ने 2013 में अपनी पुस्तक में कहा था। हथियार हस्तांतरण, कर्ज, और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के द्वारा चीन ने कम खर्च पर पाकिस्तान का उपयोग भारत के खिलाफ किया है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों का विकास चीन की मदद और अमेरिका की कृपा से किया। वास्तव में पाकिस्तान इससे भी ज्यादा जेहादियों का अड्डा बन गया। इसके बाद चीन की पाकिस्तान में रणनीतिक दखल का मार्ग और प्रशस्त हो गया।
भारत के लिए इस बढ़ते गठजोड़ के परिणाम विशेष रुप से स्पष्ट हैं क्योंकि चीन और पाकिस्तान दुराग्रही और यथास्थिति को नहीं मानकर शक्ति के बल पर भारत के अतिरिक्त क्षेत्रों पर कब्जा करने के इच्छुक है। महत्वपूर्ण रुप से चीन का रणनीतिक हस्तक्षेप जैसे-जैसे पाक अधिकृत कश्मीर में बढ़ा, उसने जम्मू एवं कश्मीर में भारत को परेशान करना प्रारंभ किया, जिसका 1/5 हिस्सा चीन के कब्जे में है। जम्मू एवं कश्मीर पर भारत की संप्रभुता पर सवाल उठाने के वह नए-नए तरीके अपनाने लगा और लद्दाख में अतिक्रमण बढ़ाने लगा। चीन ने स्पष्ट संकेत दिया है कि जम्मू एवं कश्मीर वह जगह है जहां चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भारत को दबोच सकता है। अरुणाचल प्रदेश पर इसका सैनिक दबाव का उद्देश्य इसके अन्य तरीकों से ध्यान हटाने की कोशिश हैं। पाक अधिकृत कश्मीर चीन-पाकिस्तान गठजोड़ की धमनी का कार्य कर रहा है। अधिकांश चीनी निवेश ऊर्जा परियोजनाओं में होगा।
इसमें पाकिस्तान पंजाब की सीमा पर तथाकथित आजाद कश्मीर में कारोट बांध की 1.4 अरब डॉलर की परियोजना भी शामिल है। यह बांध, चीन के 40 अरब डॉलर के रेशम मार्ग कोष द्वारा स्वीकृत प्रथम परियोजना है। कुछ प्रमुख तथ्य जिनसे सिद्ध होता है कि चीन, पाकिस्तान को अपने नवीनतम उपनिवेश के रुप में देख रहा है।
चीन दीर्घकाल की योजना बना रहा है। हिन्द महासागर और पश्चिम एशिया में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए चीन पाकिस्तान का उपयोग एक आधारभूमि के रुप में कर रहा है। वह चीन की भारत विरोधी रणनीतियों का प्रमुख अड्डा भी बन चुका है। अरब सागर तक चीन का भूमि गलियारा भारत को जम्मू एवं कश्मीर से हिन्द महासागर तक घेर देगा। विद्रोह से अशांत बलूचिस्तान बहरहाल चीन की गलियारा पहल से बाहर है।
चीन के पास पहले ही भारत के खिलाफ तीव्र आक्रमण की क्षमता है जो उसके ‘स्थानीय युद्धों में विजय’के सिद्धान्त को पुष्ट करती है (चीन के नवीनतम रक्षा श्वेत पत्र के अनुसार)। हिन्द महासागर में नौसैनिक अड्डे बनाकर चीन विदेशों में अपनी ताकत और क्षमता का विस्तार कर रहा है। चीन के तीव्रगामी सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम ने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को परिवर्तित कर दिया है।
चीन की असममित और चैथी पीढ़ी की युद्धकला, संयुक्त अभियान क्षमताएं, बढ़ी हुई रणनीतिक पहुंच से भारत को जमीनी युद्ध और हिन्द महासागर क्षेत्र में एक गंभीर चुनौती पेश हो सकती है।
चीन ने भारत के खिलाफ सीमा पर पांच से छह डिविजन तैनात कर रखी हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि हिमालय की भौगोलिक कठिनाइयों के कारण युद्ध में चीन एक बार में केवल 20 डिविजन ही तैनात कर सकता है। बहरहाल उसने तिब्बत में विशाल सुरक्षित सेना रखने के लिए आधारभूत ढांचा तैयार किया है, जिसे अल्प समय की सूचना पर आक्रमण या रक्षात्मक कार्यों के लिए तैनात किया जा सकता है। अपनी मिसाइलों के साथ चीन किसी अक्रामक अभियान में 32 से अधिक डिविजन तैनात कर सकता है जो भारत के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।
भारत की हवाई शक्ति एक सीमित युद्ध में चीन की हवाई क्षमता को टक्कर देने के लिए पर्याप्त है लेकिन एक लंबे युद्ध में इसकी क्षमता सीमित ही है।
एक युद्ध जैसी परिस्थिति में भारत को पाकिस्तान और चीन से समान बहुमुखी खतरे उत्पन्न होंगे जिनका दायरा परंपरागत, असममित और उपपरंपरागत स्तर के युद्ध से लेकर सामूहिक संहार के हथियारों के प्रयोग तक हो सकता है। इससे भी अधिक भारत को आतंकवाद साइबर और इलेक्ट्रोनिक और सूचना युद्ध जैसे खतरों का सामना भी करना होगा।
भारतीय सेनाओं को चीन के खिलाफ युद्ध की स्थिति में फारस की खाड़ी से मलक्का जलडमरुमध्य तक की समुद्री सीमा की सुरक्षा करनी होगी।

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